उत्सव कहानी और उनके किरदारों का

संस्थापक की कलम से

बुन्देलखण्ड की माटी में एक अलग ही सुगंध है। यह सुगंध केवल इतिहास की नहीं बल्कि उन अनगिनत कहानियों, लोकधुनों और भावनाओं की है जो पीढ़ियों से हमारे जीवन का हिस्सा रही हैं। जब भी मैंने इस भूमि को देखा है, मुझे यहां के हर पत्थर, हर किले और हर गीत में एक जीवंत कथा सुनाई दी है। यही अनुभूति बुन्देलखण्ड लिट्रेचर फेस्टिवल की प्रेरणा बनी।

इस महोत्सव की शुरुआत एक छोटे से विचार से हुई थी कि क्यों न अपनी मिट्टी की आवाज को एक ऐसा मंच दिया जाए जहां वह पूरे देश और दुनिया तक पहुंचे। आज जब इस प्रयास को साकार रूप लेते देखता हूं तो यह केवल एक आयोजन नहीं लगता बल्कि एक जनआंदोलन जैसा प्रतीत होता है जिसमें हर वह व्यक्ति जुड़ता है जो शब्दों, कला और संस्कृति से प्रेम करता है।

हमारा उद्देश्य केवल साहित्य तक सीमित नहीं है। हम चाहते हैं कि बुन्देलखण्ड की समृद्ध परंपरा, यहां की लोककलाएं, यहां की बोली और यहां के जीवन के रंग भी समान रूप से सामने आएं। इस फेस्टिवल में जब एक ओर अनुभवी व्यक्तित्व अपने विचार साझा करते हैं वहीं दूसरी ओर युवा प्रतिभाएं अपने सपनों को आकार देती हैं। यह संवाद ही इस आयोजन की असली शक्ति है।

आज का समय तेजी से बदल रहा है। तकनीक ने दुनिया को छोटा कर दिया है लेकिन कहीं न कहीं हमारी जड़ें पीछे छूटती जा रही हैं। ऐसे में यह महोत्सव एक सेतु का काम करता है जो परंपरा और आधुनिकता को जोड़ता है। यहां अतीत की विरासत भी है और भविष्य की संभावनाएं भी।हमें विशेष संतोष इस बात का है कि यह मंच केवल प्रतिष्ठित नामों तक सीमित नहीं है बल्कि उन उभरती आवाजों के लिए भी समान रूप से खुला है जो अपनी पहचान गढ़ने की प्रक्रिया में हैं। हमारा दृढ़ विश्वास है कि हर कहानी महत्वपूर्ण है और हर विचार एक नई दिशा छिपी होती है। मैं सभी साहित्य प्रेमियों, कलाकारों, विद्यार्थियों और सहभागियों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने इस महोत्सव को एक जीवंत अनुभव बनाया। आपका सहयोग ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।

आइए, हम सब मिलकर इस प्रयास को आगे बढ़ाएं। अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान को न केवल संजोएं बल्कि गर्व के साथ दुनिया के सामने प्रस्तुत करें। यही इस महोत्सव का उद्देश्य है और यही हमारा संकल्प भी।

चंद्रप्रताप सिंह (संस्थापक, मुखिया, बुन्देलखण्ड लिट्रेचर फेस्टिवल)

संस्थापक जी का परिचय

चन्द्रप्रताप सिंह (प्रताप राज) बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक चेतना और साहित्यिक अस्मिता को नई पहचान देने वाले ऊर्जावान, संवेदनशील और दूरदर्शी युवा व्यक्तित्व हैं। वे उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं जो अपनी मिट्टी, भाषा और लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने का साहसिक प्रयास कर रहे हैं।

बुन्देलखण्ड लिटरेचर फेस्टिवल के संस्थापक और संपादक के रूप में उन्होंने बुन्देलखण्ड की समृद्ध साहित्यिक परंपरा, लोकभाषा, लोककला और सांस्कृतिक विरासत को एक जीवंत आंदोलन का स्वरूप दिया। उनके नेतृत्व में बीएलएफ विचारों, संवादों और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ऐसा मंच बन गया जहाँ परंपरा और आधुनिकता एक साथ दिखाई देती हैं। उन्होंने बुंदेली बोली, लोकगीतों, लोकनृत्यों और क्षेत्रीय कलाकारों को नई पीढ़ी से जोड़ने का निरंतर प्रयास किया है। उनका उद्देश्य केवल संस्कृति का संरक्षण नहीं, बल्कि उसे नए समय के अनुरूप नई ऊर्जा और नई दिशा देना है।

उनकी नई पहल ‘अथाई’ इसी सांस्कृतिक दृष्टि का विस्तार है। यह मंच लोक संगीत, लोकनृत्य, रंगमंच और क्षेत्रीय सिनेमा को आधुनिक पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। ‘अथाई’ के माध्यम से वे गाँवों की मिट्टी में जन्मी कला को शहरों और नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं, ताकि लोकसंस्कृति केवल स्मृतियों में नहीं बल्कि वर्तमान जीवन का सक्रिय हिस्सा बनी रहे।

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